सोमवार, 3 अगस्त 2009

सरकार जिम्मेदार पर विभाग नहीं?


आम जनता की पहुंच से मीलों दूर 'मिड डे मिल'

परवाह तो अपनी है मासूमों की किसे है...


मिड डे मिल योजना सरकार की एक अति सराहनीय योजना एवं बहुउद्देशीय योजना है। लेकिन किसी योजना का लाभ उस अमुक व्यक्ति को मिल रहा है जिसको मिलना चाहिये, यह भी ध्यान में रखने का काम सरकारी विभाग के कर्मचारियों का है। उक्त योजना पर अमल हो रहा है या नहीं, कोई इसमें कोताई तो नहीं कर रहा है, ये सब देखना और इसमें हो रही धोखाधड़ी को रोकना सरकारी विभाग के कर्मचारियों की जिम्मेदारी है? लेकिन ऐसा नहीं कि यह सिर्फ सरकारी विभाग का ही काम है आम जनता को भी इसके काम में हो रही कोताही को रोकने का और उसकी लिखित शिकायत करने का अधिकार प्राप्त है।
1995 में मध्यान्ह भोजन योजना प्रारम्भ हुयी थी। उस समय प्रत्येक छात्र को इस योजना के अंतर्गत हर माह तीन किलोग्राम गेहूं या चावल उपलब्ध कराया जाता था। केवल खाद्यान्न उपलब्ध कराये जाने से बच्चों का स्वास्थ्य एवं उनकी स्कूल में उपस्थिति पर अपेक्षित प्रभाव नहीं पड़ा।
बच्चों को इस योजनान्तर्गत विद्यालयों में मध्यावकाश में स्वादिष्ट एवं रूचिकर भोजन प्रदान किया जाता है। इससे न केवल छात्रों के स्वास्थ्य में वृद्धि होती है अपितु वह मन लगाकर शिक्षा ग्रहण भी कर पाते हैं। इससे बीच में ही विद्यालय छोडऩे (ड्राप आउट) की स्थिति में भी सुधार आया है। भारत सरकार द्वारा निर्देशित किया गया था कि बच्चों को समस्त प्रदेशों में मध्यान्ह अवकाश में पका-पकाया भोजन उपलब्ध कराया जाये।
कतिपय कारणों से इस योजना के अंतर्गत पका-पकाया भोजन उत्तर प्रदेश में सितम्बर, 2004 तक नहीं दिया जा सका। विद्यालयों में पका-पकाया भोजन उपलब्ध कराने के सम्बन्ध में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका संख्या 196/2001 पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम् यूनियन आफ इण्डिया एवं अन्य में दिनांक 28-11-2001 को भारत सरकार को निर्देशित किया था कि 3 माह के अन्दर सरकार प्रत्येक राजकीय एवं राज्य सरकार से सहायता प्राप्त प्राइमरी विद्यालयों में पका पकाया भोजन उपलब्ध कराये। इस भोजन में 300 कैलोरी ऊर्जा तथा 8-12 ग्राम प्रोटीन उपलब्ध होगा और यह भोजन वर्ष में कम से कम 200 दिनों तक उपलब्ध कराया जायेगा। माननीय न्यायालय ने यह भी निर्देशित किया है कि योजना के अंतर्गत औसतन अच्छी गुणवत्ता का खाद्यान्न उपलब्ध कराया जायेगा। उत्तर- प्रदेश में दिनांक 01 सितम्बर, 2004 से पका-पकाया भोजन प्राथमिक विद्यालयों में उपलब्ध कराने की योजना आरम्भ कर दी गयी है। वर्तमान में भारत सरकार द्वारा मानकों में परिवर्तन करते हुए यह निर्धारित किया गया है कि उपलब्ध कराये जा रहे भोजन में कम से कम 450 कैलोरी ऊर्जा 12 ग्राम प्रोटीन उपलब्ध हो। मध्यान्ह भोजन योजना कार्यक्रम के मुख्य उद्देश्य प्रदेश सरकार शिक्षा की विभिन्न योजनाओं में अत्यधिक पूंजी निवेश कर रही है। इस पूंजी निवेश का पूर्ण लाभ तभी प्राप्त होगा जब बच्चे कुपोषण से मुक्त होकर अपनी पूर्ण क्षमता से शिक्षा निर्बाध रूप से ग्रहण करते रहें। मध्यान्ह भोजन योजना इस लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण कड़ी है। सरकार का मानना है कि इस योजना के माध्यम से शिक्षा के सार्वभौमीकरण के निम्न लक्ष्यों की प्राप्ति होगी-

  1. प्राथमिक कक्षाओं के नामांकन में वृद्धि।
  2. छात्रों को स्कूल में पूरे समय रोके रखना तथा विद्यालय छोडऩे की प्रवृत्ति (ड्राप आउट) में कमी।
  3. निर्बल आय वर्ग के बच्चों में शिक्षा ग्रहण करने की क्षमता विकसित करना।
  4. छात्रों को पौष्टिक आहार प्रदान करना।
  5. विद्यालय में सभी जाति एवं धर्म के छात्र-छात्राओं को एक स्थान पर भोजन उपलब्ध करा कर उनके मध्य सामाजिक सौहार्द, एकता एवं परस्पर भाई-चारे की भावना जागृत करना।

सवालों के घेरे में मिड डे मिल



भारत सरकार और प्रदेश सरकार के समवेत प्रयास से गरीब बच्चों के लिए मध्यान्ह भोजन योजना 15 अगस्त 1955 को लागू की गई थी जिसमें मुख्य भूमिका केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय की रही। इसके अंतर्गत कक्षा 1 से कक्षा 5 तक के सभी प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों को दोपहर में भोजन देने का प्रावधान किया गया था, चाहे संबंधित विद्यालय राज्य सरकार, परिषद अथवा अन्य सरकारी निकायों द्वारा संपोषित हो। सरकार ने मिड डे मिल के लिए काफी धन आवंटित किए और विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं की सहायता से प्राथमिक और अब कई माध्यमिक विद्यालयों में इसको लागू किया। कागजों में भले ही योजना सफल बताई जाए लेकिन वास्तविकता के धरातल पर आते ही इसके इर्द-गिर्द अनेक सवाल खड़े हो जाते हैं। विभिन्न रिपोर्ट बताते हैं कि जिन इलाकों में इस योजना की सबसे अधिक जरूरत थीं, उन्हीं इलाकों में यह धराशायी हो रही है, वहीं सबसे ज्यादा अनियमितता है। बच्चों को खाना नहीं मिल रहा है, लेकिन इसके लिए दोषी कौन है? सरकार सरकारी विभाग के वे लोग जिनको इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई है।
विभागीय कर्मचारियों की लापरवाही, कामचोरी और रिश्वतखोरी के चलते इस योजना का लाभ गरीब मासूम बच्चों को मिल पायेगा? इस विषय पर कुछ भी कहना मुनासिब नहीं होगा।
इस सरकारी तंत्र की गलतियों का हरजाना मासूम बच्चों को अपनी जान गंवा कर भरना होता है। उनके लिये जो भोजन पकाया जाता है उसमें पौष्टिकता स्वच्छता का अभाव होता है। कई बार तो सुनने में आता है कि बच्चों के भोजन में कीड़े, कंकड़ छिपकली तक पायी गयीं। अब ऐसे भोजन को ग्रहण करने वाले बच्चे मौत की गोद में नहीं जायेंगे तो कहां जायेंगे? जिनको समय पर इलाज की सुविधा उपलब्ध हो जाती है वह कभी-कभी बच भी जाते हैं। लेकिन क्या यह सिलसिला ऐसे ही चलता रहेगा, इस पर क्या कभी कोई सरकारी विभाग ध्यान नहीं देगा? इस सम्बन्ध में सभी खामोश हैं।
अभी पिछले दिनों पिठोरिया थाना क्षेत्र के कोल्हया कनान्डू ग्राम स्थित राजकीय उत्क्रमित मध्य विद्यालय में मिड डे मील के लिए पकी गरम दाल में गिरने से 7 वर्षीय बच्ची की मौत हो गयी। अफसरी परबीन नामक इस छात्रा के परिजनों ने बिना पोस्टमार्टम के बच्ची के शव को मंगलवार को दफना दिया। मामले में प्राथमिकी भी दर्ज नहीं की गयी। बाद में ग्रामीणों के उत्तेजित होने पर प्रशासन ने चुस्ती दिखाई। शिक्षकों को निलम्बन कर दिया गया। विद्यालयों एवं शिक्षा विभाग के कर्मचारियों के लापरवाही के कारण झारखंड में लगातार ऐसी घटनाएं कभी भोजन में छिपकली गिरना, तो कभी साँप एंव दूसरी जहरीली वस्तुओं का मिलना यहाँ आम बात हो गयी है। जिस कारण अनेक बच्चे बीमार हो गये और कइयों ने तो अपनी जान से भी हाथ धो दिया। यह हाल सिर्फ झारखण्ड का नहीं बल्कि कई ऐसी क्षेत्र हैं जिनमें ऐसी घटनाएं आये दिन होती रहती हैं। प्रशासन है कि चुप्पी साधे बैठा है। वह इस तरफ कोई ध्यान ही नहीं देता है।
दरअसल, मिड डे मिल योजना को लागू करना सरकार की प्राथमिकता में नहीं था। मगर, स्वयंसेवी संस्थाओं के द्वारा अत्यधिक जोर दिए जाने पार सरकार को इसे लागू करने के लिए बाध्य होना पड़ा।
देश में सबसे पहले यह तमिलनाडु में लागू किया गया। इसके पीछे मकसद यह था कि जिन बच्चों को खाना नसीब नहीं हो पाता है, वे खाना के नाम पर ही सही स्कूलों में आएंगे और यदि आयेंगे तो उन्हें शिक्षा जरूर मिल जाएगी। कारण, देश में लाखों ऐसे परिवार हैं जो पेट की क्षुधा शांत करने के चक्कर में बच्चों को शिक्षित नहीं कर पाते हैं। लेकिन वर्तमान में यह योजना सुचारू रूप से लागू नहीं हो पा रही है।
गाँव देहात एवं गरीब बच्चों को शिक्षा की ओर आकर्षित करने और उन्हें सहायता प्राप्त करने का यह एक विवेकपूर्ण एवं सराहनीय प्रयास है, परन्तु दुर्भाग्य की बात यह है कि इस योजना का शरारती तत्वों के द्वारा अनुचित उपयोग किया जाने लगा। झारखंड एवं बिहार जैसे भ्रष्ट राज्यों में इस योजना हेतु आवंटित राशि का बंदरबाँट शुरू हो गया।
स्वयंसेवी संस्था 'मंथन' के द्वारा कक्षा पांच से ऊपर के बच्चों पर किए गए सर्वेक्षण में यह देखने में आया है कि स्कूल के अधिकतर बच्चे सुबह का नाश्ता करके नहीं आते। वे बच्चे भूखे क्यों आते हैं, इसका कारण पूछने पर अधिकांश बच्चों ने इसका कारण गरीबी और परिवार की आर्थिक तंगी बताया।
ग्राम स्वराज अभियान द्वारा किए गए शोध के अनुसार पूरे देश में लगभग 20 प्रतिशत बच्चे स्कूल से बाहर हैं। जो बच्चे स्कूल जाते हैं और जिन्हें मिड डे मिल योजना का लाभ मिल जाता है उसमें अल्पसंख्यक, दलित एवं आदिवासी बच्चों के साथ भेदभाव किया जाता है। सर्वेक्षण में पाया गया कि 7 प्रतिशत स्कूलों में आपसी मतभेद योजना के सुचारू रूप ने चलने का कारण था, वहीं 9 प्रतिशत स्कूलों में शिक्षक ही उपलब्ध नहीं थे।
खाद्य एवं आपूर्ति विभाग के आंकड़ों की जुबानी बात की जाए तो भी यही परिलक्षित होता है कि मिड डे मिल योजना के मद में सरकार द्वारा जितना अनाज आवंटित हुआ था उतना खर्च नहीं हो पाया। सरकारी गोदाम में लाखों टन अनाज धरे रह गए।
विभाग द्वारा साल 2001-02 में 18.67 लाख टन चावल और 9.96 टन गेहूं आवंटित था जबकि खर्च हुए महज 13.48 लाख टन चावल और 7.28 टन गेहूं इसी प्रकार साल 2002-03 में 18.84 लाख टन चावल और 9.40 टन गेहूं के एवज में 13.75 लाख टन चावल और 7.45 टन गेहूं, साल 2003-04 में 17.72 लाख टन चावल और 9.08 टन गेहूं के एवज में 13.49 लाख टन चावल और 7.20 टन गेहूं, साल 2004-05 में 20.14 लाख टन चावल और 7.35 टन गेहूं के एवज में 15.41 लाख टन चावल और 5.92 टन गेहूं, साल 2005-06 में 17.78 लाख टन चावल और 4.72 टन गेहूं के एवज में 13.64 लाख टन चावल और 3.63 टन गेहूं और साल 2006-07 (जनवरी तक ) में 17.17 लाख टन चावल और 4.17 टन गेहूं के एवज में 10.48 लाख टन चावल और 2.85 टन गेहूं खर्च हुए हैं।

इस प्रकार सरकार द्वारा जितना अनाज आवंटित किया जाता है, संबंधित विभागीय कर्मचारी उसका सदुपयोग नहीं कर रहे हैं। सर्वशिक्षा अभियान की तरह यह भी विभागीय अकर्मण्यता और उपेक्षा का शिकार होता जा रहा है। जिस पर अभी तक किसी भी विभागीय अधिकारी का ध्यान नहीं गया है।
ऐसे तो मिड डे मिल के संचालन की पूरी जिम्मेदारी ग्राम शिक्षा समिति के अध्यक्ष माता समिति की संयोजिका की होती है। लेकिन हाल के दिनों में मध्याह्न भोजन में गड़बड़ी के कारण विभाग का कोड़ा इस कदर हेडमास्टरों एवं पारा शिक्षकों पर बरसा है कि सबने मध्याह्न भोजन को दुरुस्त करने की ठान ली है। विद्यालय के बाकी काम-काज भले ही हाशिये पर चला जाय लेकिन मध्याह्न भोजन में गड़बड़ी नहीं होनी चाहिए। प्रधानाध्यापकों ने इसके लिए बकायदे एक शिक्षक को प्रतिनियुक्त कर दिया है। खाना बनने से लेकर बंटने तक उक्त शिक्षक अध्यापन से दूर रहते हैं। यदि देखा जाय तो एक शिक्षक को 20 से 25 हजार रुपए के बीच प्राप्त होते हैं। ऐसे में मध्याह्न भोजन की निगरानी में सरकार की मोटी रकम जा रही है। शिक्षक आते हैं पढ़ाने लेकिन उनका ध्यान मध्याह्न भोजन में ही लगा रहता है। अब सरकार तय करे कि क्या बच्चों का पेट भरना ही जरूरी है या बच्चे को एक कुशल नागरिक भी बनाना है। यदि सफल शिक्षित नागरिक बनाना है तो शिक्षकों को एमडीएम से अलग रखने की मांग को बार-बार हवा में क्यों उड़ाया जा रहा है।
सर्व शिक्षा अभियान, मिड डे मिल आदि जैसी कई योजनाओं के विज्ञापन पर सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। लेकिन विभागीय कर्मचारी जिनको यह कार्य जिम्मेदारी से पूर्ण करने के लिये सौंपा गया है वह ऐसी बचकानी और लापरवाही पूर्ण हड़कतें करते हैं कि बच्चें स्कूलों में जाने से भी डरने लगें हैं। बच्चों के माता-पिता भी यह सोच रहे हैं कि उनका बच्चा स्कूल जा रहा है, पता नहीं सकुशल घर लौटेगा कि नहीं। ऐसे अकर्मन्य लापरवाह लोगों के प्रति सरकार को कठोर से कठोर कदम उठाना चाहिए, ताकि सरकार की ऐसी योजनाओं का सदुपयोग हो सके और शिक्षा विभाग की गुणवत्ता में सुधार आये।

जरा इन बातों पर भी दीजिये ध्यान...
  1. मिड डे मिल योजना के अन्तर्गत जो खाना पकाया फिर उसको बच्चों को वितरित किया जाता है उसकी गुणवत्ता तथा पौष्टिकता पर विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए।
  2. खाना पकाने और परोसने वाले क्षेत्र में सफाई सम्बन्धी कड़े नियम लागू किए जाने चाहिए।
  3. पिछले दिन के बचे हुए खाने को अगले दिन परोसने पर नियंत्रण होना चाहिए। (स्वास्थ्यकर आहार को ज्यादा समय नही रखा जा सकता, खासकर जहां मौसम ज्यादा गर्म हो।)
  4. वसा तेलों की गुणवत्ता की निगरानी की जानी चाहिए ट्रांसफैटी एसिड्स के इस्तेमाल पर रोक लगा देनी चाहिए।
  5. जहां कहीं भी संभव हो साबुत अनाज और दालों का मिड डे मील्स में इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
  6. मौसमी सस्ते और बिना कटे फल भी दिए जा सकते हैं।
  7. खाने को तैयार करते समय रंगों और एडिटिव के इस्तेमाल पर रोक होनी चाहिए।
  8. खाना बनाने के लिए आयोडीन युक्त नमक का इस्तेमाल होना चाहिए।
  9. खाने में डालने के लिए स्थानीय तौर पर उपलब्ध सस्ती गिरियों (बिना नमक लगी) फलों के बीजों का इस्तेमाल किया जा सकता है। (मूंगफली, खरबूजे, तरबूज के बीज, अखरोट आदि)
  10. अगर किसी क्षेत्र विशेष की ऐसी मांग हो तो आहार में फालिक एसिड और लौह तत्वों को शामिल किया जा सकता है।

गुरुवार, 23 जुलाई 2009

बुजुर्गों के साथ ऐसा क्यों होता है...?


आख़िर कब समझेंगे बच्चे अपनी जिम्मेदारियां ...?

मां-बाप तो जिम्मेदार होते हैं लेकिन क्या उनके बच्चे भी उनके प्रति जिम्मेदार होते हैं...? यह सवाल हम सबको अपने आप से करना चाहिये। मां-बाप अपने बच्चे को बचपन से ही अच्छी परवरिश देते हैं, अच्छा माहौल देते हैं, अच्छी शिक्षा देते हैं, उनके रहन-सहन का अच्छा इन्तजाम करते हैं ताकि उनको किसी भी तरह की कोई कठिनाई न हो। उनको पढ़ा-लिखा कर इस लायक बनाते हैं कि वह समाज में सर उठा कर चल सकें। समाज में नाम, इज्जत व सम्मान पा सकें। मां-बाप यह कभी भी नहीं चाहते कि उनके बच्चे को कोई परेशानी हो। वह उसकी हर वस्तु की पूर्ति करने की कोशिश करते हैं। अपना तन-मन-धन व रुपया-पैसा सब कुछ अपने बच्चों के लिये समर्पित कर देते हैं।
यहां तक कि अपने कलेजे के टुकड़े को अपने से दूर किसी अच्छी जगह पढऩे-लिखने को भेज देते हैं या फिर किसी अच्छी नौकरी के लिये अपने से दूर जाने देते हैं लेकिन क्या वे अपने बच्चों के बिना एक पल भी रह सकते हैं...? शायद नहीं। फिर भी वे अपने बच्चों को अपने से दूर उनका सुनहरा भविष्य सुधारने के लिये अपनी ममता का गला घोंट देते हैं। बच्चों के सामने तो झूंठी हंसी का नाटक करते हैं और अन्दर ही अन्दर आंसू को समेट कर उन्हें एक कड़ुवे अनुभव की तरह संजो लेते हैं। उनकी याद में सब कुछ भूल जाते हैं दिन-रात अपने बच्चों की भलाई की कामना करता हैं। लेकिन क्या बच्चे भी अपने मां-बाप का इसी सिद्दत के साथ उनका ख्याल रखने की कभी सोचते हैं शायद नहीं...। हां, लेकिन अपने बच्चों से अपनी सेवा की उम्मीद जरूर करते हैं।
आज अगर कोई नौवजवान अपने बूढ़े मां-बाप की सेवा नहीं करेगा, उन्हें बोझ समझकर अपने से दूर कर देगा तो क्या कल उनके बच्चे उनके साथ ऐसा नहीं करेंगे...? बिल्कुल करेंगे। क्योंकि किसी भी बच्चे में उसकी आदतें, उसके संस्कार उसके माता-पिता से आते हैं। जैसा मां-बाप को करते वे देखते हैं वेसा ही वह आगे चलकर अपने मां-बाप के साथ करते हैं।
क्या आज के बच्चे कभी अपने मां-बाप के बारे में यह सोचते हैं कि हमारे माता-पिता ने हमको इतने कष्ट सहकर हमको अच्छा पालन-पोषण दिया और इस लायक बनाया कि आज हम समाज में इज्जत से जी रहे हैं। हमको उनका भी ध्यान रखना चाहिए।
जब हमारे माता-पिता बूढ़े होते हैं, तो उनको मदद की जरूरत होती है। जब यह होता है, कई लोग सोचते हैं कि बच्चे को माता-पिता के खयाल रखना चाहिए। और कई लोग सोचते हैं कि माता-पिता को अपने आप पर ख्याल खुद रखना चाहिए। लेकिन ऐसा सोचना गलत है क्योंकि जब मँा-बाप बूढ़े होते हैं, तो उनकी सारी जिम्मेदारी उनके बच्चों की होती है। वह यह भूल जाते हैं कि मेरे माता-पिता ने सारी जिन्दगी हमारा ख्याल रखा है अच्छी परवरिश दी है। कभी कोई कमी महसूस नहीं होने दी है। जब हमारे मां-बाप बूढ़े होते हैं तो हमें भी उनकी मदद करनी चाहिए और उनको प्यार देना चाहिए। अपने सारे काम छोड़कर माता-पिता की देख-रेख करना चाहिए।
आपने श्रवण कुमार का नाम तो सुना ही होगा ,वह अपने माता-पिता का एकलौता सुपुत्र था। श्रवण कुमार के माता-पिता दोनो अन्धे थे। वो श्रवण कुमार से बहुत प्यार करते थे और श्रवण कुमार भी अपने माता-पिता की हर आज्ञा का खुशी-खुशी पालन करता था। एक बार श्रवण कुमार से उसके माता-पिता ने कहा कि हमारी सभी तीर्थ-स्थानों की यात्रा करने की तमन्ना है। तब आवाजाई के साधन तो थे नहीं और माता-पिता दोनों ही देख नहीं सकते थे। लेकिन श्रवण कुमार तो अपने माता-पिता की इच्छा को पूरा करना चाहता था तो उसने एक वन्झली बनाई और उसमे एक तरफ अपनी माता और दूसरी तरफ अपने पिता को बिठा कर निकल पडा तीर्थ-स्थानों की यात्रा पर उसने अपने माता-पिता को कन्धों पर उठा कर बहुत सारे तीर्थ-स्थानों की यात्रा कराई और एक दिन जब चलते-चलते उसके माता-पिता को प्यास लगी तो वह माता पिता को उनको एक जगह पर बिठा कर पास मे बहती नदी से पानी लेने चला गया जब वह नदी से पानी भर रहा था तो राजा दशरथ ने दूर से आवाज सुनी और कोई जंगली जानवर समझ कर तीर चला दिया और वह तीर श्रवण कुमार को लगा। उसने वहीं दम तोड़ दिया और जब उसकी मृत्यु का उसके माता-पिता को पता चला तो वह अपने पुत्र का वियोग नहीं सह पाए और उन्होंने भी वहीं अपने प्राण त्याग दिए यह था उनका आपस का प्यार, जो आज-कल समाज में कभी भी देखने को नहीं मिलता है।
श्री रामचन्द्र जी भी अपने माता-पिता से बहुत प्यार करते थे। जब उनके पिता राजा दशरथ से उनकी छोटी माँ कैकई ने राम को वन भेजने का वचन माँगा तो श्री राम ने अपने पिता का माँ कैकई को दिया हुआ वचन पूरा करने के लिए चौदह वर्ष का वनवास सहर्ष स्वीकार कर लिया। क्योंकि वो नहीं चाहते थे कि उनके पिता पर वचन ना पूरा करने का कलंक लग जाए और खुशी खुशी चौदह वर्ष के लिए वन को चले गए और उनके पिता राजा दशरथ भी अपने सुपुत्र श्री राम से इतना प्यार करते थे कि वह राम के वन जाने की बात सह ना पाए और वहीं पर अपने प्राण त्याग दिए। यह उनका अथाह प्यार ही था।
माता पिता और उसके पुत्र के प्रेम का एक और प्रमाण यह भी है कि श्री कृष्ण का जब जन्म हुआ तो उसके माता-पिता जेल मे थे। क्योंकि श्री कृष्ण के मामा कंस जानते थे कि उनका बेटा उसको मारने वाला होगा। कन्स चाह्ता था कि जैसे ही श्री-कृष्ण का जन्म होगा वह उसे मार देगा इस तरह श्री-कृष्ण उसे कभी भी मार नहीं सकेगा लेकिन कुदरत को तो कुछ और ही मन्जूर था। जैसे ही उनका जन्म हुआ जेल अपने आप खुल गई और श्री कृष्ण के पिता रात के अन्धेरे मे सबसे छुप-छुपा कर गोकुल नन्द और यशोदा के घर छोड आए और अपने पुत्र की रक्षा की और श्री कृष्ण को बड़े होकर जैसे ही अपने माता-पिता के बारे मे पता चला तो उनको कन्स की कैद से मुक्त करवाने के लिए उन्होंने केवल ग्यारह वर्ष की आयु मे ही कन्स का वध करके अपने माता-पिता वासुदेव और देवकी को आजाद करवाया। यह माता-पिता का अपने बेटे के लिए प्यार ही था कि वह बहुत वर्षो तक जेल मे रहे लेकिन फिर भी अपने पुत्र की रक्षा की और श्री-कृष्ण का भी अपने माता-पिता से सच्चा प्यार ही था जो उन्होंने कन्स का वध करके उनको आजाद करवाया।
आज के समय में ऐसा नहीं देखा जाता। माता पिता तो अपने बच्चों के लिये अपना सब कुछ कुर्बान कर उसके खुश रहने की कामना करते हैं लेकिन उनके बच्चे सिर्फ और सिर्फ अपने लिये ही सोचते हैं और जो भी करते हैं वो भी अपने लिये ही करते हैं।
आज के समय में लगभग हर संतान का अपने माता पिता से मतभेद होना देखा जा सकता है। इसका कारण अक्सर समय का बदलना होता है या माता पिता का अनुभव। यदि संतान बाइक लेना चाहता तो पिता स्कूटर दिलाने की जिद पकड़ लेते हैं नजरिया दोनों का एक होता है लेकिन विचार भिन्न। बेटा सोचता है बाइक लेकर फर्राटे से दौडाउंगा और पिता सोचता है गाडी पंचर हो गई तो स्टेपनी लगाकर आगे बढा जा सकता है। अगर इस तरह के पारिवारिक झगडे हों तो कोई बात नहीं लेकिन मामला अगर सामाजिक दायरे से बाहर का हो तो चाहें सही हो या गलत मैं सारा दोष संतान को ही दूंगा। क्योंकि जो अपने जनक को नहीं पूजेगा उसे न्याय मांगने का कोई हक नहीं है।
आखिर मां-बात भी इन्सान ही हैं, पहले सबकी वरीयताएं पता चले फिर कुछ आगे सोचो नहीं तो कभी-कभी आदर्श अन्याय का कारण बन जाते है। फिर भी माता पिता के साथ लड़ाई नहीं कर सकते, उन्होंने जन्म दिया है, पर ईश्वर के प्रति भी कुछ जिम्मेदारी है अत: विवेक और धर्म से काम लेना होगा ।
माता-पिता चाहे गोर हो या काले, अच्छे हो या बुरे, सही हो या ग़लत, सुंदर हो बदसूरत, स्वस्थ हो या बीमार-चाहे जैसे भी हों वो माता-पिता हैं। उनकी सेवा करनी चाहिये। माता-पिता से लड़ाई कराने वाले को माफ नहीं करना चाहिये और चुप भी नहीं बैठना चाहिये।


बड़े-बुजुर्गों का कहना है कि...

बदलते
समय के साथ साथ हमारे परिवार के बड़े बूढों में काफी बदलाव आया है। छोटे परिवारों में उनकी जरूरत को महसूस किया जाने लगा है और वे भी अकेले रहने की बजाय नई पीढी क़े साथ सामंजस्य बैठाने में जादा रूचि लेने लगे हैं। इससे छोटे संयुक्त परिवारों की एक नई पीढी सामने आयी है। बाबा दादी या नाना नानी को घर के बच्चों से स्वाभाविक प्यार होता है। बच्चे और बूढों में काफी समानता होती है। कहा भी गया है कि बच्चे बूढे एक समान। एक सबसे बडी समानता यह है कि दोनों गृहस्थी के बोझ से मुक्त होते हैं। इसलिए खाली समय में वे एक दूसरे के अच्छे दोस्त साबित होते हैं।

घर के बुजुर्ग छोटे बच्चों के अच्छे सांस्कृतिक शिक्षक होते हैं। अपनी संस्कृति और धर्म की शिक्षा वे बिना किसी खास मेहनत के दे डालते हैं। छोटे बच्चे कहानियों के शौक में अक्सर दादी या नानी के पास जा बैठते हैं। बाबा दादी और नाना नानी भी उन्हें राम, कृष्ण, गणेश और ध्रुव की कहानियां मजे से सुनाते हैं। जिन्हें बच्चे बडा रस ले कर सुनते हैं। ये कहानियां बच्चों के चरित्र निर्माण में बड़ी अच्छी साबित होती हैं।
बहुत से बाबा दादी या नाना नानी बडे अच्छे शिक्षक होते हैं। बाबा दादी या नाना नानी युवक युवतियों के भी बडे अच्छे दोस्त साबित होते हैं।
बदलते हुए सामाजिक परिवेश के साथ साथ दादा दादी और नाना नानी भी अब काफी बदल गये हैं। अब नानी दादी बहू बेटियों के काम में मीन मेख निकालने की बजाय सहयोग करने लग गयी हैं। पत्र पत्रिकाओं के पढने और टीवी के देखने से बूढों को अपनी पुरानी मानसिकता बदलने में मदद मिली है। आज वे पीढियों का अन्तराल लांघ कर बच्चों के अच्छे दोस्त बन गये हैं जबकि माता पिता व्यस्त होने के कारण बच्चों के इतने करीब अक्सर नहीं आ पाते हैं। ज्यादातर बाबा दादी और नाना नानी को अपने नाती पोतों की देखभाल में काफी आनंद आता है क्योंकि अपने बच्चों की देखभाल के समय वे इतने व्यस्त थे कि बच्चों की देखभाल के अपने अरमान को वे पूरा कर ही नहीं पाए।
बच्चे भी जादातर बाबा दादी और नाना नानी को अपना बेहतर भावात्मक साथी पाते हैं।
इस तरह बात करने, समाज में घुलमिल कर रहने और पीढियों को आपस में जोडने का काम बाबा दादी या नानी बडी अच्छी तरह निभाते हैं। प्रेम रखने वाले दादा दादी या नाना नानी के साथ रह कर बच्चे भी अपने नाती पोतों के लिये अच्छे बुजुर्ग साबित होते हैं। आज बहुत से लोग समझते हैं कि बुजुर्ग पुराने जमाने के हैं और बच्चों के पालन पोषण में उनका सहयोग नहीं लेते। इससे बूढों को ठेस पहुंचती है। बुजुर्गों को भी चाहिये कि वे अपने सोचने के तरीके को पुराना न पडने दें। चुस्त बने रहें और अपने बच्चों को विश्वास में लेकर चलें। हर वक्त नयी पीढी क़ी नुक्ताचीनी करने के बजाय उनकी अच्छाइयों को बताते हुए उन्हें एक सफल मां-बाप बनने के लिये प्रेरित करें।
अगर आपके बेटे-बहू यह चाहते हैं कि बच्चे दो घंटा शाम को जरूर पढे तो इस समय बच्चे की इच्छा जानकर उसे टीवी के पास बुला कर बेटे बहू को नाराज न करें। इससे बच्चा बिगड़ जायेगा। अगर आपसे यह नहीं देखा जाता कि घर के सब लोग आराम से टीवी देख रहे हैं और बच्चा पढ रहा है तो बेहतर यह होगा कि आप बच्चे की सहायता करें और उसे कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही दो घंटा पढा दें। आप भी खुश आपका बेटा भी और पोता भी। यह भी ध्यान रखें कि अगर माता पिता बच्चों को डांट रहे हों तो बीच में न बोलें और बाद में माता पिता और बच्चों को अलग अलग समझाएं ताकि डांट खाने की स्थितियां पैदा ही न हों।


वह भी तो इन्सान हैं, उनको भी जीने का हक़ है...

समय
के साथ बदलते परिवेश में अक्सर यह देखा जाता है कि कई बच्चे अपने मां-बाप की सम्पत्ति के लिये तो उनकी सेवा करते हैं लेकिन तब तक, जब तक कि वह उनके नाम नहीं होती है। एक बार सम्पत्ति पाने के बाद मां-बाप क्या होता है, वे यह भी भूल जाते हैं। अपने मां-बाप को हरिद्वार, काशी, मथुरा या फिर पैतृक निवास गांव आदि जगहों पर रहने के लिये छोड़ देते हैं। ये बेचारे! जिन्होंने अपने बच्चों के लिये अपना सब कुछ उन पर न्योछावर कर दिया उनके साथ ऐसा बरताव... यह कहां की रीति है।
अक्सर रेलवे प्लेटफार्म पर या लोकल रेलगाड़ी के जनरल डिब्बों में ऐसी बूढ़ी महिलाएं या बूढ़े पुरुष देखे जा सकते हैं जो अपना सब कुछ गंवा कर इस हालत तक पहुंचाये गये हैं। पहुंचाने वाला और कोई नहीं बल्कि उनके अपने ही बच्चे या फिर परिवार के लोग होते हैं।
कई बूढ़े पुरुष व महिलाएं जो कि लावारिस की तरह भिखारिन जैसी हालत में लोकल ट्रेन में या प्लेटफार्म पर लाश की तरह से पड़ी रहती हैं। कोई संस्था ऐसे लोगों के लिये इच्छुक नहीं रहती। मुंबई में ऐसे सैकड़ों बुजुर्ग हैं जो बस, दौड़ती लोकल ट्रेनों में भिखारियों की तरह से महानगर के एक कोने से दूसरे कोने में घिसटते हुए एक दिन लावारिस मौत मर जाते हैं। मुझे हजारों बार इस बात का अनुभव हुआ कि किस तरह क्रूर और कमीने बच्चे अपने बुजुर्ग माता-पिता को हजारों किलोमीटर दूर जाने वाली मुंबई की गाड़ी में बैठा कर अपनी जिंदगी जीने के लिये इन माता-पिता से छुटकारा पा लेते हैं जो कि कभी तकलीफ़ उठा कर उन एहसन $फरामोश औलादों के लिये भूखे रहे होंगे।
ये समाज को क्या हो रहा है? बच्चे अपनी जिंदगी में मां-बाप को इतनी बड़ी अड़चन समझते हैं कि हजारों किलोमीटर दूर इस तरह बेहाल सी गुमनामी भरी दुखद मौत के लिए बेरहमी से छोड़ देते हैं। लाशें इधर उधर पड़ी रहती है। फिर महानगर की नगरपालिका इन्हें फूंक कर अपनी जिम्मेदारी निभा देती है। मेरे भीतर के सवाल जल कर खत्म नहीं हो रहे हैं, दिमाग में एक ओर वह मां है जिसका दिमागी संतुलन बुढ़ापे के कारण हल्का सा डगमगा गयी हो, याददाश्त क्षीण हो गयी हो पर बच्चों को अभी भी प्यार करती हो और उनके पास जाना चाहती हो। दूसरी तरफ वे बच्चे जो कि अपने मां-बाप को बोझ समझकर उन्हें अपने से कहीं दूर पहुंचाकर या उन्हें दूर रहने को विवश कर उनसे अपना पीछा छुड़ा लेते हैं।
उन सन्तानों को यह क्यों नहीं समझ में आता है कि उनके मां-बाप, जो कि उनसे इतना प्यार करते हैं, उनको अपनी क्षमता से ज्यादा खुशियां देने की कोशिश करते हैं हम उनके साथ ऐसा बरताव कर रहे हैं...आखिर क्यों? आखिर वह भी इन्सान हैं, उनको भी जीने का हक है।