सोमवार, 18 सितंबर 2017

आजादी होने पर भी ये जिहादी

*मुस्लिमो के आतंक से दुखी होकर मुसलमानो पर सबसे ज्यादा जुल्म करने वाले देश...*🚩🚩
*1--चीन:- रोजा रमजान दाढ़ी बुरखा सब*
*प्रतिबंधित!*
*2--म्यांमार:- मुस्लिम को देखते ही मारने का आदेश* *मस्जिदे लगभग सभी गिरा दी*
*गयी!*
*3--जापान:- इस्लाम प्रतिबंधित , इस्लाम का प्रचार एक क़ानूनी अपराध*
*4--अंकोला:- इस्लाम प्रतिबंधित*
*5--फ़्रांस:- 210 मस्जिदे एक दिन में गिराई*
*6--ऑस्ट्रेलिया:- मुस्लिम को दी चेतावनी,कानून माने या देश छोड़े*
*7--ब्रिटेन:- मुस्लिम से भेदभाव और नफरत*
*8--अमेरिका:- एयरपोर्ट पर ही चड्डी उतरवा लेना , शाहरुख़ और आज़म खान भुक्त*
*भोगी*
*9--इसराइल:- मुस्लिम का कट्टर शत्रु*
*अब मुस्लिम देशो में मुस्लिम का हाल...*
*1--पाकिस्तान;- शिया सुन्नी के नाम पर हर साल दंगे , औसतन पाकिस्तान में हर साल 4000 शिया क़त्ल किये जाते है , उनकी मस्ज़िदों को सुन्नी बम से उड़ाते है!*
*2--अफगानिस्तान:- आये दिन बम धमाके , बेकसूर मुस्लिम की मौत!*
*3- इराक:- शिया सुन्नी की लड़ाई और बम धमाके*
*4--ईरान:- सुन्नियो से नफरत , सऊदी अरब से नफरत*
*5--लीबिया:- आये दिन बम धमाके*
*6--सीरिया:- दंगे , बम धमाके*
*7--मिस्र:- शिया सुन्नी संघर्ष*
*8--बांग्लादेश:- आये दिन बम धमाके*
*फिर भी भारत में मुस्लिम पर अत्याचार होता है , यहाँ ये सुरक्षित नहीं है।*
*यहाँ ये कही भी मुर्दा गाड़कर उस पर हरी चादर डालकर जमीन पर कब्ज़ा कर शुरू हो जाते*
*है.....*
*फिर भी असुरक्षित है जब चाहे मौलाना बरकती जैसे लोग प्रधानमंत्री को गाली देते*
*है....*
*ओवैसी जैसे आतंकवादी 15* *मिनट में 100 करोड़* *हिन्दुओ की गर्दन काटने की बात करते*
*है*
*हुर्रियत के नेता पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाते है!*
*बंगाल और असम के मुस्लिम गद्दारी करते हुए बंगलादेशियो को शरण दे रहे*
*है*
*और एक पाखण्ड का दूसरा नाम आमिर खान! इतने सारे एपिसोड "सत्यमेव जयते" का आमिर खान लेकर आया लेकिन कभी भी उसने हिन्दूओ को इस्लाम मे होने वाले:"हलाला","गजवा हिन्द","ट्रिपल तलाक","मदरसा छाप शिक्षा","पत्थर-बाजी""जनसंख्या-विस्फोट","बहु-विवाह""अशिक्षा""बुरका""खुला"का पता तक नहीं होने दिया !*
*इतनी आजादी होने पर भी ये जिहादी कहते है कि इनपर भारत मे जुल्म होता है।।🚩🚩*

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2009

शिक्षा का बदलता स्वरूप

शिक्षा का बदलता स्वरूप
बिना गुरु के ज्ञान असम्भव

वर्तमान समय में लोग कहते हैं कि गुरु व शिष्य के बीच सेवा भाव का लोप हो गया है। लेकिन ऐसा नहीं है। गुरु अपने शिष्य को विद्यालय से अलग बुलाकर विशेष तरीके से उसको शिक्षित करता है। शिष्य भी अपने कत्र्तव्य से पीछे नहीं हटता है। अपने गुरु व गुरुजी के घर के सारे कामों को बखूबी जिम्मेदारी से करता है। आधुनिक गुरु अर्थात अध्यापक लोग अपने शिष्यों यानी छात्रों के लिये विशेष शिक्षा केन्द्रजैसे कोचिंग सेण्टर व इंस्टीट्यूट जैसे कुटीर व लघु शिक्षा केन्द्रों (उद्योग धन्धों) का शुभारम्भ किया बल्कि उसे पूर्ण रूप से विकसित भी किया। इस प्रक्रिया को वह लोग निरन्तर प्रगति की ओर बढ़ाते भी जा रहे हैं।
हमारे देश में कई वेद, शास्त्र व पुराण अनेक विद्वानों द्वारा लिखे गये। लेकिन इस कोचिंग व्यवस्था पर कोई ग्रन्थ या पुराण नहीं लिखा गया। शास्त्रों की बखिया उधेडऩे वाले उन विद्वानों के लिए यह डूब मरने की बात है जिन्होंने वेदों में प्रमुख ऋगुवेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद और शास्त्रों और पुराणों में अग्निपुराण, भागवतपुराण, भविष्यपुराण, ब्रह्मपुराण, ब्रह्माण्डपुराण, गरुणपुराण, कर्मपुराण, लिंगपुराण, मारकाण्डेय पुराण, मतस्यपुराण, नारद पुराण, नरसिह्मापुराण, पदमपुराण, शिवपुराण, स्कन्द पुराण, वैवत्रपुराण, वामन पुराण, वारहपुराण, विष्णुपुराण। लेकिन कलयुग के इस आधुनिक युग के लिये एक बेहद जरूरी व महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखना भूल गये। जिसका नाम मेरे हिसाब से कोचिंग सेण्टर या फिर लघु व कुटीर उद्योग शिक्षा-शास्त्र/पुराण होना चाहिये।
हमारे आधुनिक अध्यापक इस ग्रन्थ की उपयोगिता व आवश्यकता को समझते हुये इसकी नींव रख दी है। वे छात्रों को कोचिंग पढऩे के लिये अपने नवीनतम तरीकों से मजबूर करते रहते हैं।
इसके कई तरीके हैं- कक्षा में देर से आना, कक्षा में पहुँचकर माथा पकड़कर बैठ जाना। एकाध सवाल समझाकर सारे कठिन सवाल गृह-कार्य के रूप में देना। यदि छात्र कक्षा में कुछ पूछे तो - 'कक्षा के बाद पूछ लेना' कह देना। कक्षा के बाद पूछे तो 'घर आओ तब ही ढंग से बताया जा सकता है।' दूसरी विधि-छमाही परीक्षा में चार-पाँच को छोड़ बाकी छात्रों को फेल कर देना। फिर देखिए सुबह-शाम छात्रों की भीड़ अध्यापकों के घर में दिखने लगती है।
अभिभावक लोग अध्यापक से न जाने क्यों जलते हैं? जो अपनी ही आग में जला जा रहा है उस बेचारे से क्या जलना? राम तो विष्णु के अवतार थे उन्हें भी गुरु के घर जाना पड़ा। यह कारण था कि अल्पकाल में ही उन्होंने सारी विद्याएँ प्राप्त कर लीं थीं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी इस बात की पुष्टि की है- गुरु गृह गए पढऩ रघुराई। अल्पकाल विद्या सब पाई। जब भगवान का यह हाल था तो भला आज के छात्र की क्या औकात कि वह अपने विषय के अध्यापक से विशेष प्रकार की शिक्षा ग्रहण (ट्यूशन न पढ़े) न करे।
कलयुगी अध्यापकों ने अपनी काबिलियत और ज्ञान को बेचना अपना पेशा बना लिया है। ये कोचिंग सेण्टर के नाम से अपनी दुकानें चलाते हैं। कुछ लोग यह काम बड़े स्तर पर करते हैं। इसके लिये वे इंस्टीट्यूट नामक बड़े उद्योग की शुरूआत करते हैं।
इस प्रकार जब उनकी दुकानें चल निकलती हैं तो दो शिफ्टों में सुबह और शाम को वास्तविक पढ़ाई शुरू हो जाती है। गुरु जी पढ़ाते समय विभिन्न दैनिक एवं पारिवारिक कार्यों को भी संपन्न करते रहते हैं, अच्छा भी है-एक पंथ दो काज।
कुछ लोग कहते हैं कि छात्रों के हृदय से सेवा-भावना का लोप हो रहा है। इन गैर सरकारी 'कुटीर एवं लघु शिक्षा केन्द्रों व इंस्टीट्यूट जैसे बड़ी उद्योग फर्मों का निरीक्षण करें तो उन्हें अपनी विचारधारा बदल देनी पड़ेगी। सुबह के समय एक छात्र डेरी से दूध ला रहा है। दूसरा छात्र अपने गुरु के पुत्र को उसके विद्यालय पहुँचा रहा है। तीसरा छात्र गुरु पत्नी की सेवा में जुटा हैं और सिल पर मसाला पीस रहा है, चौथा छात्र घर की रसोई में सहायता कर रहा है। चक्की से गेहूँ पिसवा कर लाना, सब्ज़ी मंडी से सब्ज़ी लाना, धोबी के यहाँ मैले कपड़े भिजवाना, गुरु जी के लिए दुकान से बीड़ी-पान खऱीद कर लाना इन सभी कार्यों को छात्र ही संपन्न करते हैं। उसके बावजूद भी कुछ बुद्धिजीवी लोग यही कहते हैं कि छात्रों के हृदय से अपने गुरु अर्थात अध्यापक के प्रति सेवा-भावना का लोप हो रहा है। यह तो सरासर नाइन्साफी है छात्रों के साथ।
यदि सेवा भावना से गुरु प्रसन्न है तब भगवान भी कुछ नहीं बिगाड़ सकता। गुरु जी अगर नाराज है तो भगवान भी सहायता नहीं कर सकते। ज्ञान ध्यान स्नान के लिए एकांत होना आवश्यक है। कक्षा की भीड़-भाड़ में ज्ञान-चर्चा करना व्यर्थ है। आज हमारी सरकार शिक्षा-नीति के परिवर्तन पर बहुत ध्यान दे रही हैं। मेरी सलाह कोई माने तो 'हींग लगे न फिटकारी रंग चोखा चढ़े।' सब विद्यालय बंद करा दिए जाएं। भवन-निर्माण, फर्नीचर, वेतन सभी खर्च समाप्त। छात्रों के उज्जवल भविष्य व अच्छी पढ़ाई के लिये कुटीर एवं लघु उद्योग व शिक्षा-केंद्र चलाने के लिए धाकड़ अध्यापकों को प्रोत्साहित किया जाए। क्योंकि वर्तमान में जाने-अनजाने में हो तो यही रहा है। विद्यालय में छात्रों की संख्या भले ही कम हो लेकिन इन पढ़ाई के कुटीर एवं लघु उद्योग व शिक्षा-केंद्रों पर किसी विद्यालय के छात्रों की संख्या से यहां की संख्या कम नहीं होती। इस कारण अध्यापकों का भी कत्र्तव्य बनता है कि वह अपने प्रिय छात्रों का विशेष रूप से ध्यान रखें। आखिर वह बड़ी-बड़ी रकम ट्यूशन फीस के रूप में जो देते हैं। इसलिये अध्यापक अपने इस कत्र्तव्य पथ से जरा भी भ्रमित नहीं होते। अपना कार्य वे बखूबी निभाते हैं।
अपने प्रिय छात्र के लिए अध्यापक को कम पापड़ नहीं बेलने पड़ते हैं। परीक्षा कक्ष में नकल की विशेष छूट देना, पेपर आउट करना, कापी में नंबर बढ़ाना या घर जाकर कापी में लिखवाना। लिखित परीक्षा में दस प्रतिशत नंबर लाने वाले छात्र को प्रयोगात्मक परीक्षा में नब्बे प्रतिशत अंक दिलवाना आदि बहुत-सी सेवाएँ सम्मिलित हो जाती हैं।
यदि कोई सनकी अध्यापक इनके धंधे-पानी में बाधा बनता है तो ये विषैले साँप बनकर उसे डसने का मौका ढूँढ़ते रहते हैं। मुँह का ज़ायका बदलने के लिए ये चुगली का भी सहारा लेते हैं। यदि अर्ध-वार्षिक परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने वाले छात्रों को बोर्ड की परीक्षा से वंचित करने का नियम दिया जाए। इससे ट्यूशन के कुटीर उद्योग को प्रोत्साहन मिलेगा तथा धंधे की गिरती हुई प्रतिष्ठा को बल मिलेगा।
कानपुर कभी अनेक लघु एवं कुटीर उद्योग धन्धे व बड़े-बड़े कारखाने का केन्द्र माना जाता था। लेकिन समय के साथ वे सब तो बन्द हो गये लेकिन कानपुर वासियों ने उसकी अस्मिता को बचाये रखा। उन्होंने कोचिंग व ट्यूशन के बहाने से कुटीर एवं लघु उद्योग व शिक्षा-केन्द्रों का न कि शुभारम्भ किया बल्कि उसे पूर्ण रूप से विकसित भी किया। वर्तमान में कानपुर शिक्षा का केन्द्र माना जाने लगा है। कोचिंग सेण्टर व कुटीर एवं लघु उद्योग व इंस्टीट्यूट जैसी बहुत सी फर्में जो जगह-जगह हैं इस बात का प्रमाण हैं।

ध्वस्त होता ट्राफिक! सिपाहियों को है न फिक्र

ध्वस्त होता ट्राफिक! सिपाहियों को है न फिक्र

कानपुर। भाइयों आपने एक कहावत तो सुनी ही होगी 'एक अनार, सौ बीमार'। शहर के यातायात की भी कुछ यही स्थिति है। यहां ट्राफिक सिपाहियों से दो गुने तो चौराहे हैं। अब इस स्थिति में यातायात व्यवस्था सुधरे भी कैसे? लगभग पिछले कुछ वर्षों से यह समस्या है पर प्रशासन है कि सिपाहियों की नयी भर्ती करता ही नहीं है। अब जितने सिपाही हैं उससे दो गुने होमगार्डों को शामिल कर शहर के चौराहों पर तैनात किया जाता है जिससे शहर की यातायात व्यवस्था को नियंत्रित किया जा सके। अब जिन चौराहों पर ट्राफिक पुलिस या होमगार्डों के जवान नहीं तैनात होते हैं वहीं से यातायात व्यवस्था ध्वस्त होने लगती है।
शहर मे बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं का सबसे बड़ा कारण ध्वस्त हो चुकी यातायात व्यवस्था हैं। जिसके बारे में रोज नये नये समीकरण बनाये जाते हैं परन्तु चंद दिनों के बाद वो सभी समीकरण फेल हो जाते हैं। कुछ गिनें चुनें प्रमुख चौराहो के अलावा पूरे कानपुर में यातायात व्यवस्था का कोई उदाहरण देखने को नहीं मिलता हैं। जिन छोटे चौराहों तथा नाकों पर यातायात व्यवस्था रखी गई हैं। वहां ट्रैफिक पुलिस, सिपाही व होमगार्ड किसी पेंड़ की छांव में बैठें कर धूम्रपान का आनंद उठाते देखे जाते हैं। वो अपनी हरकत में तभी आते हैं जब वहां जाम लग जाता हैं या फिर उनको पता होता है कि कोई अधिकारी यहां से गुजरने वाला है। इसके बाद यातायात सामान्य हो जाने पर वो पुन: अपने आंनद में डूब जाते हैं।
यातायात व्यवस्था ध्वस्त होने का एक और मुख्य कारण यह भी है कि सिपाहियों और होमगार्डों को अपना जेब खर्च भी ड्यिूटी के समय निकालना होता है। ये लोग प्राय: उन नवजवान लड़कों की तलाश में रहते हैं जिनके पास कुछ पैसे होने की सम्भावना उनके लगती है या फिर नये वाहन होते हैं और उनको देखकर यह आभास होता है कि ये कम से कम १००-२०० दे सकता है। पहले तो ये लाइसेंस मांगते हैं, लाइसेंस होने पर गाड़ी के कागज मांगते हैं, वो भी हों तो गाड़ी का मीटर सही है या नहीं, गाड़ी की सभी लाइटें सही हैं या नहीं वगैरह-वगैरह....। कुछ भी करके उनको अपना खर्चा निकालना होता है। चूंकि सिपाहीगण इस काम में व्यस्त रहते हैं तो जिन चौराहों पर सिपाहियों की तैनाती होती है वहां भी जाम लगने लगता है। फिर ये कुछ अपनी हरकत में आ जाते हैं और ड्यिूटी पर तैनात दिखाई देने लगते हैं। पर कुछ समय के लिये। जाम कम होते ही ये फिर अपने-अपने काम में लग जाते हैं।
टैम्पो, विक्रम, ट्रैक्टर, ट्रक आदि जैसी गाडिय़ों का तो इनका फिक्स चार्ज होता है। अगर यहां से गुजरना है तो इतना...इतना...इतना देना है। अगर कोई टैम्पो दिन में चार बार एक स्थान से गुजरती है तो टैम्पो चालक को चार बार गैर कानूनी टैक्स (रिश्वत) देना होता है।
इस प्रकार से इनके पूरे दिन का शाही भोजन व खर्चवाहन चालक पूरा करते हैं। ये सरकार से वेतन केवल बैठने का और कामचोरी का लेते हैं।
अगर इसी तरह ये आंनद लेते रहेगें तो उन वाहन चालकों का क्या होगा जिन्हें ये भी नहीं पता कि अपने घर से मात्र २० किमी. जाने में वो अपने घर वापस सही सलामत आ पायेंगें या यातायात व्यवस्था की भेंट चढ़ जायेंगे।
रात लगभग दस के बाद नो इंट्री खुलने के ट्रक, टैण्कर जैसे बड़े वाहन इतनी तेजी से निकलते हैं कि अगर कोई सामने आ जाये तो वह बच नहीं सकता। उसको अपनी जान गंवानी पड़ती है। वह भी क्या करें अगर वह सामान्य गति अर्थात निर्धारित गति से चलेंगे तो उनको सिपाहीगण जगह-जगह पर रोक कर अपना गैर कानूनी टैक्स यानी रिश्वत वसूलते हैं। यह टैक्स प्रति वाहन २० से ५० रुपये तक होता है किसी-किसी से १०० तक मिल जाये तो कोई मनाही नहीं है। इनके २० रुपये, ५० रुपये के लालच में आम जनता को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है। क्योंकि सिपाहियों से बचने के लिये यह जरूरत से ज्यादा तेजी से चलते हैं और ऐसी स्थिति में दुर्घटनाओं की सम्भावना बढ़ जाती है।
पता नहीं कब सुधरेगी यातायात व्यवस्था और शहर के यातायात को नियंत्रित रखने वाली ये कानून व्यवस्था। ऐसी स्थितियों में तो सड़क पर चलना सिर्फ भगवान भरोसे है।